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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 11
अतो धनर्ण सुमहत्‌ तेषां गतिवशाद्भवेत्‌ । आकृष्यमाणास्तैरेवं व्योम्नि यान्त्यनिलाहता: ॥
यही कारण है कि भौमादि ग्रहों में उनकी गतियों के कारण धन एवं ऋण संस्कार अधिक होते हैं। इस प्रकार प्रबह वायु के वेग से आहत होकर अपने अपने पातों से आकृष्ट होते हुये भौमादि ग्रह आकाश में अपनी-अपनी वक्षा में भ्रमण करते हैं।
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