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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 33
इष्टज्यातश्चापानयनम्‌ ज्यां प्रोज्ञय शेषं तत्वाश्विहतं तद्विवरोद्धृतम्‌ । सड्ख्यातत्वाश्विसंवर्ग संयोज्य धनुरुच्यते ॥
इष्टज्या से जितनी ज्या घट सके उन्हें घटाकर शेष को २२५ से गुणा कर उसमें दोनों (गत और गम्य) ज्या के अन्तर से भाग देने पर प्राप्त लब्धि को, शुद्ध ज्या संख्या और २२५ के गुणनफल में जोड़ देने पर अभीष्ट चाप का मान ज्ञात हो जायेगा।
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