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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 40
शीघ्रफलोपयोगि शीघ्रकर्णानयनम्‌ शैघ्यं कोटिफलं केन्द्रे मकरादौ धन स्मृतम्‌ । संशोध्यं तु त्रिजीवायां कर्क्यादी कोटिजं फलम्‌ ॥
मकरादि (मकर राशि के आरम्भ से मिथुन राशि के अन्त तक) छ राशियों में यदि शीघ्रकेन्द्र हो तो शीघ्रकोटिफल का त्रिज्या में धन संस्कार करने से (अर्थात्‌ त्रिज्या + शीघ्रकोटिफल) तथा कर्कादि (कर्क राशि के आरम्भ से धनु राशि के अन्त पर्यन्त) छ: राशियों में शीघ्र केन्द्र हो तो शीघ्रकोटिफल का त्रिज्या में रण संस्कार (अर्थात्‌ त्रिज्या - शीघ्रकोटिफल) करने से स्पष्ट शीघ्रकोटि होती है। शीघ्र भुभषफल और शीघ्रकोटि फल के वर्ग योग का वर्गमूल स्फूट शीजघ्रकर्ण होता है।
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