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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 5
ग्रहे धनर्णत्वम्‌ स्वोच्चापकृष्टा भगणै: प्राग्मुखं यान्ति यद्‌ ग्रहा: । तत्‌ तेषु धनमित्युक्तं फल पश्चान्मुखेष्वृूणम्‌ ॥
अपने अपने उच्च स्थानों से अपंकृष्ट ग्रह अपने मध्यम स्थान से जितने राश्यादि तक पूर्व दिशा में जाते हैं उतने राश्यादि मान (उच्चाकर्षण फल) मध्यम ग्रह में जोड़े जाते हैं। अत: इसे धन संस्कार कहते हैं तथा पश्चिम दिशा में उच्चाकर्षण फल घटाया जाता है अतएव उसे ऋण संस्कार कहते हैं।
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