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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 62
चरसंस्कार: दिनरात्रिमानञज्च तत्कार्मकमुदक्क्रान्तौ धनहानी पृथक्‌ स्थिते । स्वाहोरात्र-चतुभगि. दिनरात्रिदले स्मृते ॥
उकत चरज्या को चापात्मक बनाने से चरासु होते हैं । उत्तरक्रान्ति होने पर चरासु को अहोरात्रासु के चतुर्थाश में (इनके घट्यात्मक मान को अहोरात्र के चतुर्थाश घटी में) जोड़ने से दिनार्ध तथा घटाने के रात्रय्ध काल होता है। दक्षिण क्रान्ति होने पर विपरीत संस्कार करने से, अर्थात्‌ अहोरात्र के चतुर्थाश में चरघटी के ऋण संस्कार करने से दिनार्ध तथा धन संस्कार करने से रात्र्यर्द्ध मान होता है।
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