मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 39
मन्दफलसाधनम्‌ तदगुणे भुजकोटिज्ये भगणांशविभाजिते । तद्भुजज्याफल धनुर्मान्दं लिप्तादिकं फलम्‌ ॥
इष्ट स्थानीय स्पष्ट परिधि से मन्दकेन्द्र भुजज्या को तथा केन्द्र कोटिज्या को गुणा कर भगणांश ३६० से भाग देने पर क्रम से भुजफल एवं कोटिफल सिद्ध होंगे। भुजफल के चाप का कलादि मान मन्दफल होता है। भूगर्भ से मन्दप्रतिवृत्त स्थित ग्रह पर्यन्त जाने वाला सूत्र मन्दकर्ण होता है। दृश्य ग्रह की स्थिति प्रतिवृत्त में तथा मध्यम ग्रह की स्थिति कक्षा वृत्त में होती है। कक्षा वृत्त और प्रतिवृत्त के केन्द्रों एवं परिधि को स्पर्श करने वाली ऊर्ध्वधि: रेखा को नीचोच्च सूत्र कहा जाता है। भूगर्भ से दृश्य ग्रह तक जाने वाले सूत्र और कक्षा वृत्त के सम्पात विन्दु पर मन्दस्पष्ट ग्रह होता है। दृश्य ग्रह से नीचोच्च रेखा के समानान्तर कक्षा वृत्तव्यास पर लम्ब रूप रेखा का सम्पात विन्दु वक्षावृत्त में मध्यम ग्रह होता है। मध्यम और मन्द स्पष्ट ग्रह का अन्तर मन्दफल होता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
सूर्य सिद्धांत के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

सूर्य सिद्धांत के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें