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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 6
पाताकर्षणम्‌ दक्षिणोत्तरतोष्प्येव॑ पातो राहु: स्वरंहसा । विक्षिपत्येष विक्षेपं चन्द्रादीनापक्रमात्‌ ॥
इसी प्रकार (पूर्वोक्त कारणों की तरह) राहु नामक पात (स्वविमण्डल एवं क्रान्ति मण्डल का सम्पात) भी क्रान्त्यन्त बिन्दु से ग्रह को अत्यन्त वेग से उत्तर और दक्षिण दिशा में विक्षेप तुल्य दूरी तक विक्षिप्त करता है।
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