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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 63
याम्यक्रान्तीं विपर्यस्ते द्विगुणे तु दिनक्षपे। विक्षेपयुक्तोनितया क्रान्त्या भानामपि स्वके ॥
दोनों को द्विगुणित करने पर क्रम से दिनमान और रात्रिमान होते हैं। इसी प्रकार विक्षेप को क्रान्ति में धन ऋण कर (चर साधन द्वारा) नक्षत्रों का दिनरात्रि मान ज्ञात करना चाहिये।
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