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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 42
लब्धस्य चाप लिप्तादि फल शैघ्यमिदं स्मृतम्‌ । एतदाद्ये कुजादीनां चतुर्थ चेव कर्मणि ॥
यह शीघ्रफल भौमादि पज्चताणग्रहों के प्रथम और चतुर्थ कर्म (संस्कार) में उपयोगी होता है।
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