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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 67
करणान्याह ध्रुवाणि शकुनिर्नागं तृतीय तु चतुष्पदम्‌ । किस्तुषघ्न॑ तु चतुर्दश्या: कृष्णायाश्चापरार्धत: ॥
कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के उत्तरार्ध से क्रमश: शकुनि, चतुष्पद, नाग, तथा किस्तुध्न ये चार स्थिर करण होते हैं।
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