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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 31
अभीष्टांशानां ज्यासाधनम्‌ लिप्तास्तत्वयमैर्भक्ता लब्धं ज्यापिण्डकं गतम्‌ । गतगम्यान्तराभ्यस्तं विभजेत्‌ तत्वलोचनै: ॥
जिस चाप की ज्या अभीष्ट हो, उस चाप की कला को २२५ से भाग देने पर लब्धि गत ज्यापिण्ड होता है। शेष को ऐष्य (अग्रिम) ज्या पिण्ड और गत ज्या पिण्ड के अन्तर से गुणा कर
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