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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 32
तदवाप्तफल योज्य ज्यापिण्डे गतसजक्ञके । स्यात्‌ क्रमज्या विधिरयमुत्क्रमज्यास्वपि स्मृत:॥
गुणन फल को २२५ से भाग देने पर जो लब्धि प्राप्त हो उसे गत ज्यापिण्ड में जोड़ने से अभीष्ट चाप की ज्या होगी। यही ज्या, साधन की विधि हैं तथा इसी प्रकार उत्क्रमज्या का भी साधन किया जाता है।
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