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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 15
राशिलिप्ताष्टमो भाग: प्रथमं ज्वयार्थमुच्यते । तत्तद्विभकक्‍त लब्धोनमिश्रितं तद्‌ द्वितीयकम्‌ ॥
एक राशि में जितनी कलाएं होती है उनके अष्टमांश को प्रथम ज्यार्ध कहते हैं। (अर्थात्‌ १ राशि x ३० = ३० x ६० = १८०० कला। १८०० का १/८ = २२५ कला = १ ज्यार्ध) प्रथम ज्यार्ध को प्रथम ज्यार्ध से ही भाग देकर लब्धिं को प्रथम ज्यार्ध में घटाकर शेष को प्रथम ज्यार्ध में जोड़ने से द्वितीय ज्यार्ध का मान होता है।
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