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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 60
क्रान्तिज्या द्युज्या-चराणाउच साधनम्‌ क्रान्ते: क्रमोत्क्रमज्ये द्वे कृत्वा तत्रोत्क्रमज्यंया । हीना त्रिज्या दिनव्यासदलं तद-दक्षिणोत्तरम्‌ ॥
स्फुटक्रान्ति से ज्या (क्रान्तिज्या) और उत्क्रमज्या दोनों का साधन कर त्रिज्या में से उत्क्रमज्या को घटाने से शेष अहोगणात्रवृत्त का व्यासार्द्ध होता है, इसे द्युज्या भी कहते हैं। यह व्यासार्द्ध, दक्षिणक्रान्ति होने पर दक्षिणगोल का, उत्तराक्रान्ति होने पर उत्तरगोल का होता है।
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