केद्रनिर्देशपुरस्सर भुजकोटिज्ययोरान॑यनम्
ग्रह संशोध्य मन्दोच्चात् तथा शीघ्राद् विशोध्य च ।
शेष॑ केन्द्र पद॑ तस्माद् भुजज्या कोटिरेव च ॥
(अहर्गणोत्पन्न) मध्यमग्रह को अपने अपने मन्दोच्च एवं शीघ्रोच्च से घटाने पर शेष क्रमश: मन्द केन्द्र और शीघ्र केन्द्र होते हैं। ( अर्थात् मन्दोच्च - मध्यम ग्रह = मन्द केन्द्र, शीघ्रोच्च - मध्यमग्रह = शीभघ्रकेन्द्र) केन्द्र से पद ज्ञान तथा पद से भुज और कोटि का ज्ञान किया जाता है।
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