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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 41
तद्‌बाहुफलवर्गैक्यान्मूल कर्णश्चलाभिध: । शीघ्रफलसाधनम्‌ त्रिज्याभ्यस्तं भुजफल चलकर्णविभाजितम्‌ ॥
भुजफल को त्रिज्या से गुणाकर चलकर्ण (शीघ्रकर्ण) से भाग देने पर लब्धि (शीघ्रफलज्या) का चाप (धनु) कलादि शीघ्रफल होता है।
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