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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 51
चलकर्णहतं भुक्तौ कर्ण त्रिज्याईधिके धनम्‌ । ऋणमूनेडधिके प्रोज्य्य शेष॑ वक्रगतिर्भवेत्‌ ॥
शीघ्रकर्ण यदि त्रिज्या से अधिक हो तो फल धन अल्प हो तो फल ऋण होता है। मन्दस्पष्ट गति में शीघ्र गतिफल का धन ऋण संस्कार करने से स्पष्ट गति होती है। यदि ऋण शीघ्रगतिफल मन्दस्पष्ट गति से अधिक हो तो शीघ्र गतिफल से मन्द स्पष्ट गति को घटाने पर जो शेष रहे वह ग्रह की वक्रगति होती है।
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