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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 16
आद्येनैव क्रमात्‌ पिण्डान्‌ भक्त्वा लब्धोनसंयुता: । खण्डका: स्युश्चतुर्विशज्ज्यार्धपिण्डा: क्रमादमी ॥
आद्य (प्रथम) ज्यार्ध से अग्रिम पिण्डों को विभकत कर लब्धि से रहित ज्याखण्डों को ज्यार्ध में जोड़ने से अग्रिम ज्यापिण्ड होता है। इसी प्रकार क्रम सें २४ ज्यार्ध पिण्डों के मान होते हैं। यथा---राशि लिप्ता = १८०० कला। १८०० x १/८ = २२५ = प्रथम ज्यार्द्ध पिण्ड।
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