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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 58
क्रान्तिशरसंस्कार: विक्षेपापक्रमैकत्वे क्रान्तिर्वि क्षेपसंयुता । दिग्भेदे वियुता स्पष्टा भास्करस्य यथाड्गता ॥
विक्षेप (शर) और मध्यमक्रान्ति की एक ही दिशा हो तो विक्षेप और क्रान्ति का योग करने से स्पष्ट क्रान्ति होती है। विक्षेप और क्रान्ति की दिशा भिन्‍न होने पर क्रान्ति और विक्षेप का अन्तर करने से स्पष्ट क्रान्ति होती है। सूर्य की गणितागत (परमापक्रमज्या तु सप्तरन्ध्रगुणेन्द्व: । २८ वें श्छोकोक्‍क्त विधि से प्राप्त) क्रान्ति ही स्फुट क्रान्ति होती है। क्‍योंकि क्रान्ति वृत्त में भ्रमण करने से सूर्य का विक्षेप नहीं होता।
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