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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 57
स्वपातोनाद्‌ ग्रहाज्जीवा शीघ्राद्भूगुजसौम्ययो: । विक्षेपघ्नान्त्यकर्णाप्ता विक्षेपस्त्रिज्यया विधो: ॥
स्पष्ट भौम, गुरु और शनि ग्रहों को अपने अपने संस्कृत पातों से रहित कर ( स्प. ग्रह - प्पात =) शेष की जीवा साधन करनी चाहिये तथा बुध और शुक्र के शीघ्रोच्चों से उनके पातों को घटाकर शेष की जीवा साधन करनी चाहिये। इस प्रकार साधित जीवा, को विक्षेप (परमशर) से गुणाकर गुणनफल में अन्त्य कर्ण (चतुर्थ कर्म में प्रयुक्त होने वाले शीघ्रकर्ण) से भाग देने से कलात्मक लब्धि क्रान्तिसंस्कार योग्य शर होता है। चन्द्रमा के साधन में शीघ्रकर्ण का उपयोग न होने से स्पष्टचन्द्र से पात को घटाकर शेष की जीवा को विक्षेप से गुणा कर त्रिज्या से भाग देने पर लब्धि चन्द्रमा का कलात्मक विक्षेप होता है।
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