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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 13
तत्रातिशीघ्रा शीघ्राख्या मन्दा मन्दतरा समा । ऋज्वीति पज्चधा ज्ञेया या वक्रा सातिवक्रगा ॥
इन आठ प्रकार की गतियों में अतिशीघ्र, शीघ्र, मन्द, मन्दतर और सम ये पाँच प्रकार की मार्गी (ऋजुमार्गी) गतियाँ है। जो वक्रगति है, वहीं अनुवक्र भी हैं अर्थात्‌ वक्र अनुवक्र एवं कुटिल (विकल) ये तीनों गतियाँ वक्र (अनुलोम) गति संज्ञक होती हैं। इस प्रकार गतियों के मार्गी और वक्री प्रमुख दो भेद होते हैं।
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