मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 56
शरानयनमाह कुजाकिंगुरुपातानां ग्रहवच्छीघ्रज॑ फलम्‌ । वाम॑ तृतीयक॑ मान्दं बुधभार्गवयो: फलम्‌ ॥
अहर्गणोत्पन्न भौम शनि और गुरु के पातों में ग्रहवत्‌ शीघ्र फल का संस्कार करना चाहिये। अर्थात्‌ ग्रहस्फुटीकरण में चतुर्थसंस्कार शीघ्रफल को धन हो तो धन, ऋण हो तो ऋण #रने से स्फुट शरसाधनोपयोगी पात होता है। बुध और शुक्र के पातों का तृतीयसंस्कार अर्थात्‌ मन्दफल का विपरीत संस्कार करना चाहिये। यदि ऋण हो तो धन, धन हो तो ऋण करना चाहिये । यहाँ चन्द्रमा के पात का उल्लेख नहीं है अत: चन्द्रमा का गणितगत पात ही ग्राह्म है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
सूर्य सिद्धांत के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

सूर्य सिद्धांत के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें