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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 2 • श्लोक 46
भुजान्तरसंस्कार: अर्कबाहुफलाभ्यस्ता ग्रहभुक्तिर्विभाजिता । भचक्रकलिकाभिस्तु लिप्ता: कार्या ग्रहेडर्कवत्‌ ॥
सूर्य के भुजफल (मन्दफल) को ग्रहगतिकला से गुणाकर गुणनफल को भचक्रकला (३६० » ६० - २१६०० कला) से भाग देने पर जो कलात्मक लब्धि हो उसे भुजान्तर कहते हैं। उसका संस्कार अभीष्ट ग्रह में सूर्य मन्दफल के अनुसार करना चाहिये। अर्थात्‌ सूर्यमन्दफल धन हो तो ग्रह में लब्धि जोड़ने से मन्दफल ऋण हो तो ग्रह से लब्धि को घटाने से अर्धरात्रिकालिक स्पष्ट ग्रह होता है।
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