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अध्याय 1 — श्रीरामगीता
श्रीरामगीता
60 श्लोक • केवल अनुवाद
किसी दिन भगवान् राम, जिनके चरणकमलों की सेवा साक्षात् श्रीलक्ष्मीजी करती हैं, एकान्त में बैठे हुए थे। उस समय शुद्ध विचारवाले लक्ष्मणजी ने (उनके पास जाकर) उन्हें भक्तिपूर्वक प्रणामकर अति विनीतभाव से कहा।
हे महामते! आप शुद्धज्ञानस्वरूप, समस्त देहधारियों के आत्मा, सबके स्वामी और स्वरूप से निराकार हैं। जो आपके चरणकमलों के लिये भ्रमररूप हैं, उन परमभागवतों के सहवास के रसिकों को ही आप ज्ञानदृष्टि से दिखलायी देते हैं।
हे प्रभो! योगिजन जिनका निरन्तर चिन्तन करते हैं, संसार से छुड़ाने वाले उन आपके चरणकमलों की मैं शरण हूँ, आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे मैं सुगमता से ही अज्ञानरूपी अपार समुद्र के पार हो जाऊँ।
श्रीलक्ष्मणजी के ये सब वचन सुनकर शरणागतवत्सल भूपालशिरोमणि भगवान् राम सुनने के लिये उत्सुक हुए लक्ष्मण को उनके अज्ञानान्धकार का नाश करने के लिये प्रसन्नचित्त से ज्ञानोपदेश करने लगे।
(भगवान् श्रीराम बोले) सबसे पहले अपने-अपने वर्ण और आश्रम के लिये (शास्त्रों में) बतलायी हुई क्रियाओं का यथावत् पालनकर, चित्त शुद्ध हो जाने पर उन कर्मो को छोड़ दे और शम-दमादि साधनों से सम्पन्न हो आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिये सदगुरु की शरण में जाय।
कर्म देहान्तर की प्राप्ति के लिये ही स्वीकार किये गये हैं; क्योंकि उनमें प्रेम रखने वाले पुरुषों से इष्ट-अनिष्ट दोनों ही प्रकार की क्रियाएँ होती हैं। उनसे धर्म और अधर्म दोनों ही की प्राप्ति होती है और उनके कारण शरीर प्राप्त होता है, जिससे फिर कर्म होते हैं। इसी प्रकार यह संसार चक्र के समान चलता रहता है।
संसार का मूल कारण अज्ञान ही है और इन (शास्त्रीय) विधिवाक्यों में उस (अज्ञान)-का नाश ही (संसार से मुक्त होने का) उपाय बतलाया गया है! अज्ञान का नाश करने में ज्ञान ही समर्थ है, (सकाम) कर्म नहीं, क्योंकि उस (अज्ञान)-से उत्पन्न होने वाला कर्म उसका विरोधी नहीं हो सकता।
सकाम कर्म द्वारा अज्ञान का नाश अथवा राग का क्षय नहीं हो सकता, बल्कि उससे दूसरे सदोष कर्म की उत्पत्ति होती है। उससे पुनः संसार की प्राप्ति होना अनिवार्य है। इसलिये बुद्धिमान को ज्ञानविचार में ही तत्पर होना चाहिये।
कुछ वितर्कवादी ऐसा कहते हैं कि जिस प्रकार वेद के कथनानुसार ज्ञान पुरुषार्थ का साधक है, वैसे ही कर्म वेदविहित हैं; और प्राणियों के लिये कर्मो की अवश्य-कर्तव्यता का विधान भी है, इसलिये वे कर्मज्ञा के सहकारी हो जाते हैं। साथ ही श्रुति ने कर्म न करने में दोष भी बतलाया है;
इसलिये मुमुक्षुको उन्हें सर्वदा करते रहना चाहिये। यदि कोई कहे कि ज्ञान स्वतन्त्र है एवं निश्चय ही अपना फल देने वाला है, उसे मन से भी किसी और की सहायता की आवश्यकता नहीं है तो उसका यह कहना ठीक नहीं;
क्योंकि जिस प्रकार (वेदोक्त) यज्ञ सत्य कर्म होने पर भी अन्य कारकादि की अपेक्षा करता ही है, उसी प्रकार विधि से प्रकाशित कर्मो के द्वारा ही ज्ञान मुक्ति का साधक हो सकता है। (अतः कर्मो का त्याग उचित नहीं है)
(सिद्धान्ती-) ऐसा जो कोई कुतर्की कहते हैं, उनके कथमन में प्रत्यक्ष विरोध होने के कारण वह ठीक नहीं है; क्योंकि कर्म देहाभिमान से होता है और ज्ञान अहंकार के नाश होने पर सिद्ध होता है।
(वेदान्तवाक्यों का विचार करते-करते) विशुद्ध विज्ञान के प्रकाश से उद्धासित जो चरम आत्मवृत्ति होती है, उसी को विद्या (आत्मज्ञान) कहते हैं। इसके अतिरिक्त कर्म सम्पूर्ण कारकादि की सहायता से होता है, किन्तु विद्या समस्त कारकादि का (अनित्यत्व की भावना द्वारा) नाश कर देती है।
इसलिये समस्त इन्द्रियों के विषयों से निवृत्त होकर निरन्तर आत्मानुसन्धान में लगा हुआ बुद्धिमान् पुरुष सम्पूर्ण कर्मों का सर्वथा त्याग कर दे; क्योंकि विद्या का विरोधी होने के कारण कर्म का उसके साथ समुच्चवय नहीं हो सकता।
जब तक माया से मोहित रहने के कारण मनुष्य का शरीरादि में आत्मभाव है, तभी तक उसे वैदिक कर्मानुष्ठान कर्तव्य है। 'नेतिनेति' आदि वाक्यों से सम्पूर्ण अनात्मवस्तुओं का निषेध करके अपने परमात्मस्वरूप को जान लेने पर फिर उसे समस्त कर्मों को छोड़ देना चाहिये।
जिस समय परमात्मा और जीवात्मा के भेद को दूर करने वाला प्रकाशमय विज्ञान अन्तःकरण में स्पष्टतया भासित होने लगता है। उसी समय आत्मा के लिये संसार-प्राप्त की कारण माया अनायास ही कारकादि के सहित लीन हो जाती है।
श्रुति-प्रमाण से उसके नष्ट कर दिये जाने पर फिर वह अपना कार्य करने में समर्थ भी किस प्रकार हो सकेगी? क्योंकि परमार्थतत्त्व एकमात्र ज्ञानस्वरूप, निर्मल और अद्वितीय है। अतः (बोध हो जाने पर ) फिर अविद्या उत्पन्न नहीं होगी।
जब एक बार नष्ट हो जाने पर अविद्या का फिर जन्म ही नहीं होता तो बोधवान् को 'मैं इस कर्म का कर्ता हूँ' - ऐसी बुद्धि कैसे हो सकती है? इसलिये ज्ञान स्वतन्त्र है, उसे जीव के मोक्ष के लिये किसी और (कर्मादि) की अपेक्षा नहीं है, वह स्वयं अकेला ही उसके लिये समर्थ है।
इसके सिवा तैत्तिरीय शाखा की प्रसिद्ध श्रुति भी आग्रहपूर्वक स्पष्ट कहती है कि समस्त कर्मों का त्याग करना ही अच्छा है तथा 'एतावत्' इत्यादि वाजसनेयी शाखा की श्रुति भी कहती है कि मोक्ष का साधन ज्ञान ही है कर्म नहीं।
और तुमने जो ज्ञान की समानता में यज्ञादि का दृष्टान्त दिया सो ठीक नहीं है, क्योंकि उन दोनों के फल अलग-अलग हैं। इसके अतिरिक्त यज्ञ तो (होता, ऋत्विकू, यजमान आदि) बहुत-से कारकों से सिद्ध होता है और ज्ञान इससे विपरीत है (अर्थात् वह कारकादि से साध्य नहीं है)।
(कर्म के त्याग करने से) मैं अवश्य प्रायश्चित्त-भागी होऊँगा - ऐसी अनात्म-बुद्धि अज्ञानियों कों हुआ करती है, तत्त्वज्ञानी को नहीं। इसलिये विकाररहित चित्त वाले बोधवान् पुरुष को विहित कर्मों का भी विधिपूर्वक त्याग कर देना चाहिये।
फिर शुद्धचित्त होकर श्रद्धापूर्वक गुरु की कृपा से 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य के द्वारा परमात्मा और जीवात्मा की एकता जानकर सुमेरु के समान निश्चल एवं सुखी हो जाय।
यह नियम ही है कि प्रत्येक वाक्य का अर्थ जानने में पहले उसके पदों के अर्थ का ज्ञान ही कारण है। (इस “तत्त्वमसि” महावाक्य के) "तत्" और "त्वम्" पद क्रम से परमात्मा और जीवात्मा के वाचक हैं और "असि" उन दोनों की एकता करता है।
इन दोनों (जीवात्मा और परमात्मा) में जीवात्मा प्रत्यक् (अन्तःकरण का साक्षी) है और परमात्मा परोक्ष (इन्द्रियातीत) है, इस (वाच्यार्थरूप) विरोध को छोड़कर और लक्षणावृत्ति से लक्षित उनकी शुद्ध चेतनता को ग्रहणकर उसे ही अपना आत्मा जाने और इस प्रकार एकीभाव से स्थित हो।
इन "तत्" और "त्वम्" पदों में एकरूप होने के कारण जहतीलक्षणा नहीं हो सकती और परस्पर विरोध होने के कारण अजहल्लक्षणा भी नहीं हो सकती। इसलिये "सो5यम्" (यह वही है) इन दोनों पदों के अर्थ की भाँति इन "तत्" और "त्वम्" पदों में भी भागत्यागलक्षणा ही निर्दोषता से हो सकती है।
पृथिवी आदि पंचीकृत भूतों से उत्पन्न हुए, सुख-दु:खादि कर्मभोगों के आश्रय और पूर्वोपार्जित कर्मफल से प्राप्त होने वाले इस मायामय आदि-अन्तवान् शरीर को विज्ञजन आत्मा की स्थूल उपाधि मानते हैं और
मन, बुद्धि, दस इन्द्रियाँ तथा पाँच प्राण (इन सत्रह अंगों) से युक्त और अपंचीकृत भूतों से उत्पन्न हुए सूक्ष्म शरीर को जो भोक्ता के सुख-दुःखादि अनुभव का साधन है, आत्मा का दूसरा देह मानते हैं।
(इनके अतिरिक्त) अनादि और अनिर्वाच्य मायामय कारण-शरीर ही जीव का तीसरा देह है। इस प्रकार उपाधि-भेद से सर्वथा पृथक् स्थित अपने आत्मरूप को क्रमश: (उपाधियों का बोध करते हुए) अपने हृदय में निश्चय करे।
स्फटिकमणि के समान यह आत्मा भी (अननमयादि) भिन्न-भिन्न कोशों में उनके संग से उन्हीं के आकार का भासने लगता है। किन्तु इसका भली प्रकार विचार करने से यह अद्वितीय होने के कारण असंगरूप और अजन्मा निश्चित होता है।
त्रिगुणात्मिका बुद्धि की ही स्वप्न, जाग्रत् और सुषुप्ति - भेद से तीन प्रकार की वृत्तियाँ दिखायी देती हैं, किन्तु इन तीनों वृत्तियों में से प्रत्येक का एक-दूसरी में व्यभिचार होने के कारण ये (तीनों ही) एकमात्र कल्याणस्वरूप नित्य परब्रह्म में मिथ्या हैं (अर्थात् उसमें इन वृत्तियों का सर्वथा अभाव है)।
बुद्धि की वृत्ति ही देह, इन्द्रिय, प्राण, मन और चेतन आत्मा के संघातरूप से निरन्तर परिवर्तित होती रहती है। यह वृत्ति तमोगुण से उत्पन्न होने वाली होने के कारण अज्ञानरूपा है और जब तक यह रहती है, तब तक ही संसार में जन्म होता रहता है।
"नेति-नेति" आदि श्रुति-प्रमाण से निखिल संसार का बोध करके और हृदय में चिद्घनामृत का आस्वादन करके सम्पूर्ण जगत् को, उसके साररूप सत् (ब्रह्म )-को ग्रहण करके त्याग दे, जैसे नारियल के जल को पीकर मनुष्य उसे फेंक देते हैं।
आत्मा न कभी मरता है न जन्मता है; वह न कभी क्षीण होता है और न बढ़ता ही है। वह पुरातन, सम्पूर्ण विशेषणों से रहित, सुखस्वरूप, स्वयंप्रकाश, सर्वगत और अद्वितीय है।
जो इस प्रकार ज्ञाममय और सुखस्वरूप है, उसमें यह दुःखमय संसार की प्रतीति कैसे हो सकती है? यह तो अध्यास के कारण अज्ञान से ही दिखायी दे रहा है, ज्ञान से तो यह एक क्षण में ही लीन हो जाता है; क्योंकि ज्ञान और अज्ञान का परस्पर विरोध है।
भ्रम से जो अन्य में अन्य की प्रतीति होती है, उसी को विद्दानों ने अध्यास कहा है। जिस प्रकार असर्परूप रज्जु आदि में सर्प की प्रतीति होती है, उसी प्रकार ईश्वर में संसार की प्रतीति हो रही है।
जो विकल्प और माया से रहित है, उस सबके कारण निरामय, अद्वितीय और चित्स्वरूप परमात्मा ब्रह्म में पहले इस 'अहंकार' रूप अध्यास की ही कल्पना होती है।
सबके साक्षी आत्मा में इच्छा, अनिच्छा, राग-द्वेष और सुखदुःखादिरूप बुद्धि की वृत्तियाँ ही जन्म-मरणरूप संसार की कारण हैं; क्योंकि सुषुप्ति में इनका अभाव हो जाने पर हमें आत्मा का सुखरूप से भान होता है।
अनादि अविद्या से उत्पन्न हुई बुद्धि में प्रतबिम्बित यह चेतन का प्रकाश ही 'जीव' कहलाता है। बुद्धि के साक्षीरूप से आत्मा उससे पृथक् है, वह परात्मा तो बुद्धि से अपरिच्छिन्न है।
अग्नि से तपे हुए लोहे के समान चिदाभास, साक्षी आत्मा तथा बुद्धि के एकत्र रहने से परस्पर अन्योन्याध्यास होने के कारण क्रमश: उनकी चेतनता और जडता प्रतीत होती है। (अर्थात् जिस प्रकार अग्नि से तपे हुए लोहपिण्ड में अग्नि और लोहे का तादात्म्य हो जाने से लोहेका आकार अग्नि में और अग्नि की उष्णता लोहे में दिखायी देने लगती है, उसी प्रकार बुद्धि और आत्मा का तादात्म्य हो जाने से आत्मा की चेतनता बुद्धि आदि में और बुद्धि आदि की जडता आत्मा में प्रतीत होने लगती है । इसलिये अध्यासवश बुद्धि से लेकर शरीरपर्यन्त अनात्म-वस्तुओं को ही आत्मा मानने लगते हैं)।
गुरु के समीप रहने से और वेदवाक्यों से आत्मज्ञान का अनुभव होने पर अपने हृदयस्थ उपाधिरहित आत्मा का साक्षात्कार करके आत्मारूप से प्रतीत होने वाले देहादि सम्पूर्ण जडपदार्थो का त्याग कर देना चाहिये।
मैं प्रकाशस्वरूप, अजन्मा, अद्वितीय, निरन्तर, भासमान, अत्यन्त निर्मल, विशुद्ध विज्ञानघन, निरामय, क्रियारहित और एकमात्र आनन्दस्वरूप हूँ।
मैं सदा ही मुक्त, अचिन्त्यशक्ति, अतीन्द्रिय, ज्ञानस्वरूप, अविकृतरूप और अनन्त-पार हूँ। वेदवादी पण्डितजन अहर्निश मेरा हृदय में चिन्तन करते हैं।
इस प्रकार सदा आत्मा का अखण्डवृत्ति से चिन्तन करने वाले पुरुष अन्तः:करण में उत्पन्न हुई विशुद्ध भावना तुरन्त ही कारकादि के सहित अविद्या का नाश कर देती है, जिस प्रकार नियमानुसार सेवन की हुई ओषधि रोग को नष्ट कर डालती है।
(आत्मचिन्तन करने वाले पुरुष को चाहिये कि) एकान्त देश में इन्द्रियों को उनके विषयों से हटकर और अन्त:करण को अपने अधीन करके बैठे तथा आत्मा में स्थित होकर और किसी साधन का आश्रय न लेकर शुद्धचित्त हुआ केवल ज्ञानदृष्टि द्वारा एक आत्मा की ही भावना करे।
यह विश्व परमात्मस्वरूप है, ऐसा समझकर इसे सबके कारणरूप आत्मा में लीन करे; इस प्रकार जो पूर्ण चिदानन्दस्वरूप से स्थित हो जाता है, उसे बाह्य अथवा आन्तरिक किसी भी वस्तु का ज्ञान नहीं रहता।
समाधि प्राप्त होने के पूर्व ऐसा चिन्तन करे कि सम्पूर्ण चराचर जगतू केवल ओंक्कार मात्र है। यह संसार वाच्य है और ओंकार इसका वाचक है। अज्ञान के कारण ही इसकी प्रतीति होती है। ज्ञान होने पर इसका कुछ भी नहीं रहता।
(ओंकार में अ, उ और म - ये तीन वर्ण हैं; इनमें से) अकार विश्व (जागृति के अभिमानी) का वाचक है, उकार तैजस (स्वप्न का अभिमानी) कहलाता है और मकार प्राज्ञ (सुषुप्तिक अभिमानी) को कहते हैं; यह व्यवस्था समाधिलाभ से पहले की है, तत्त्वदृष्टि से ऐसा कोई भेद नहीं है।
नाना प्रकार से स्थित अकाररूप विश्व-पुरुष को उकार में लीन करे और ओंझकार के द्वितीय वर्ण तैजसरूप उकार को उसके अन्तिम वर्ण मकार में लीन करे।
फिर कारणात्मा प्राज़्ररूप मकार को भी चिद्घनरूप परमात्मा में लीन करे; (और ऐसी भावना करे कि) वह नित्यमुक्त विज्ञानस्वरूप उपाधिहीन निर्मल परब्रह्म मैं ही हूँ।
इस प्रकार निरन्तर परमात्मभावना करते-करते जो आत्मानन्द में मग्न हो गया है तथा जिसे सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच विस्मृत हो गया है, वह नित्य आत्मानन्द का अनुभव करने वाला जीवन्मुक्त योगी निस्तरंग समुद्र के समान साक्षात् मुक्तस्वरूप हो जाता है।
इस प्रकार जो निरन्तर समाधियोग का अभ्यास करता है, जिसके सम्पूर्ण इन्द्रियगोचर विषय निवृत्त हो गये हैं तथा जिसने काम-क्रोधादि सम्पूर्ण शत्रुओं को परास्त कर दिया है, उस छठहों इन्द्रियों (मन और पाँचों ज्ञानेन्द्रियों ) को जीतने वाले महात्मा को मेरा निरन्तर साक्षात्कार होता है।
इस प्रकार अहर्निश आत्मा का ही चिन्तन करता हुआ मुनि सर्वदा समस्त बन्धनों से मुक्त होकर रहे तथा (कर्ता-भोक्तापन के) अभिमान को छोड़कर प्रारब्धकल भोगता रहे। इससे वह अन्त में साक्षात् मुझ ही में लीन हो जाता है।
संसार को आदि, अन्त और मध्य में सब प्रकार भय और शोक का ही कारण जानकर समस्त वेदविहित कर्मों को त्याग दे तथा सम्पूर्ण प्राणियों के अन्तरात्मारूप अपने आत्मा का भजन करे।
जिस प्रकार समुद्र में जल, दूध में दूध, महाकाश में घटाकाशादि और वायु में वायु मिलकर एक हो जाते हैं, उसी प्रकार इस सम्पूर्ण प्रपंच को अपने आत्मा के साथ अभिनरूप से चिन्तन करने से जीव मुझ परमात्मा के साथ अभिन्न भाव से स्थित हो जाता है।
यह जो जगत् है वह श्रुति, युक्ति और प्रमाण से बाधित होने के कारण चन्द्रभेद और दिशाओं में होने वाले दिग्भ्रम के समान मिथ्या ही है - ऐसी भावना करता हुआ लोक (व्यवहार) में स्थित मुनि इसे देखे।
जब तक सारा संसार मेरा ही रूप दिखलायी न दे, तब तक निरन्तर मेरी आराधना करता रहे। जो श्रद्धालु और उत्कट भक्त होता है, उसे अपने हृदय में सर्वदा मेरा ही साक्षात्कार होता है।
हे प्रिय! सम्पूर्ण श्रुतियों के साररूप इस गुप्त रहस्य को मैंने निश्चय करके तुमसे कहा है। जो बुद्धिमान् इसका मनन करेगा, वह तत्काल समस्त पापों से मुक्त हो जायगा।
भाई! यह जो कुछ जगत् दिखायी देता है, वह सब माया है। इसे अपने चित्त से निकालकर मेरी भावना से शुद्धचित्त और सुखी होकर आनन्दपूर्ण और क्लेशशून्य हो जाओ।
जो पुरुष अपने चित्त से मुझ गुणातीत निर्गुण का अथवा कभी-कभी मेरे सगुण स्वरूप का भी सेवन करता है, वह मेरा ही रूप है। वह अपनी चरण-रज के स्पर्श से सूर्य के समान सम्पूर्ण त्रिलोकी को पवित्र कर देता है।
यह अद्वितीय ज्ञान समस्त श्रुतियों का एकमात्र सार है। इसे वेदान्तवेद्य भगवत्पाद मैंने ही कहा है। जो गुरुभक्तिसम्पन्न पुरुष इसका श्रद्धापू्वक पाठ करेगा, उसकी यदि मेरे वचनों में प्रीति होगी तो वह मेरा ही रूप हो जायगा।
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