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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 34
एवंविधे ज्ञानमये सुखात्मके कथं भवो दुःखमयः प्रतीयते । अज्ञानतोऽध्यासवशात्प्रकाशते ज्ञाने विलीयेत विरोधतः क्षणात् ॥
जो इस प्रकार ज्ञाममय और सुखस्वरूप है, उसमें यह दुःखमय संसार की प्रतीति कैसे हो सकती है? यह तो अध्यास के कारण अज्ञान से ही दिखायी दे रहा है, ज्ञान से तो यह एक क्षण में ही लीन हो जाता है; क्योंकि ज्ञान और अज्ञान का परस्पर विरोध है।
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