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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 35
यदन्यदन्यत्र विभाव्यते भ्रमा- दध्यासमित्याहुरमुं विपश्चितः । असर्पभूतेऽहिविभावनं यथा रज्ज्वादिके तद्वदपीश्वरे जगत् ॥
भ्रम से जो अन्य में अन्य की प्रतीति होती है, उसी को विद्दानों ने अध्यास कहा है। जिस प्रकार असर्परूप रज्जु आदि में सर्प की प्रतीति होती है, उसी प्रकार ईश्वर में संसार की प्रतीति हो रही है।
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