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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 2
त्वं शुद्धबोधोऽसि हि सर्वदेहिना- मात्मास्यधीशोऽसि निराकृतिः स्वयम् । प्रतीयसे ज्ञानदृशां महामते पादाब्जभृङ्गाहितसङ्गसङ्गिनाम् ॥
हे महामते! आप शुद्धज्ञानस्वरूप, समस्त देहधारियों के आत्मा, सबके स्वामी और स्वरूप से निराकार हैं। जो आपके चरणकमलों के लिये भ्रमररूप हैं, उन परमभागवतों के सहवास के रसिकों को ही आप ज्ञानदृष्टि से दिखलायी देते हैं।
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