समाधि प्राप्त होने के पूर्व ऐसा चिन्तन करे कि सम्पूर्ण चराचर जगतू केवल ओंक्कार मात्र है। यह संसार वाच्य है और ओंकार इसका वाचक है। अज्ञान के कारण ही इसकी प्रतीति होती है। ज्ञान होने पर इसका कुछ भी नहीं रहता।
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