(भगवान् श्रीराम बोले) सबसे पहले अपने-अपने वर्ण और आश्रम के लिये (शास्त्रों में) बतलायी हुई क्रियाओं का यथावत् पालनकर, चित्त शुद्ध हो जाने पर उन कर्मो को छोड़ दे और शम-दमादि साधनों से सम्पन्न हो आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिये सदगुरु की शरण में जाय।
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