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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 5
श्रीरामचन्द्र उवाच - आदौ स्ववर्णाश्रमवर्णिताः क्रियाः कृत्वा समासादितशुद्धमानसः । समाप्य तत्पूर्वमुपात्तसाधनः समाश्रयेत्सद्गुरुमात्मलब्धये ॥
(भगवान्‌ श्रीराम बोले) सबसे पहले अपने-अपने वर्ण और आश्रम के लिये (शास्त्रों में) बतलायी हुई क्रियाओं का यथावत्‌ पालनकर, चित्त शुद्ध हो जाने पर उन कर्मो को छोड़ दे और शम-दमादि साधनों से सम्पन्न हो आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिये सदगुरु की शरण में जाय।
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