यदि स्म नष्टा न पुनः प्रसूयते
कर्ताहमस्येति मतिः कथं भवेत् ।
तस्मात्स्वतन्त्रा न किमप्यपेक्षते
विद्य विमोक्षाय विभाति केवला ॥
जब एक बार नष्ट हो जाने पर अविद्या का फिर जन्म ही नहीं होता तो बोधवान् को 'मैं इस कर्म का कर्ता हूँ' - ऐसी बुद्धि कैसे हो सकती है? इसलिये ज्ञान स्वतन्त्र है, उसे जीव के मोक्ष के लिये किसी और (कर्मादि) की अपेक्षा नहीं है, वह स्वयं अकेला ही उसके लिये समर्थ है।
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