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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 13
विशुद्धविज्ञानविरोचनाञ्चिता विद्यात्मवृत्तिश्चरमेति भण्यते । उदेति कर्माखिलकारकादिभि- र्निहन्ति विद्याखिलकारकादिकम् ॥
(वेदान्तवाक्यों का विचार करते-करते) विशुद्ध विज्ञान के प्रकाश से उद्धासित जो चरम आत्मवृत्ति होती है, उसी को विद्या (आत्मज्ञान) कहते हैं। इसके अतिरिक्त कर्म सम्पूर्ण कारकादि की सहायता से होता है, किन्तु विद्या समस्त कारकादि का (अनित्यत्व की भावना द्वारा) नाश कर देती है।
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