केचिद्वदन्तीति वितर्कवादिन-
स्तदप्यसदृष्टविरोधकारणात् ।
देहाभिमानादभिवर्धते क्रिया
विद्या गताहङ्कृतितः प्रसिध्द्यति ॥
(सिद्धान्ती-) ऐसा जो कोई कुतर्की कहते हैं, उनके कथमन में प्रत्यक्ष विरोध होने के कारण वह ठीक नहीं है; क्योंकि कर्म देहाभिमान से होता है और ज्ञान अहंकार के नाश होने पर सिद्ध होता है।
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