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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 21
सप्रत्यवायो ह्यहमित्यनात्मधी- रज्ञप्रसिद्धा न तु तत्त्वदर्शिनः । तस्माद्बुधैस्त्याज्यमविक्रियात्मभि- र्विधानतः कर्म विधिप्रकाशितम् ॥
(कर्म के त्याग करने से) मैं अवश्य प्रायश्चित्त-भागी होऊँगा - ऐसी अनात्म-बुद्धि अज्ञानियों कों हुआ करती है, तत्त्वज्ञानी को नहीं। इसलिये विकाररहित चित्त वाले बोधवान्‌ पुरुष को विहित कर्मों का भी विधिपूर्वक त्याग कर देना चाहिये।
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