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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 44
विविक्त आसीन उपारतेन्द्रियो विनिर्जितात्मा विमलान्तराशयः । विभावयेदेकमनन्यसाधनो विज्ञानदृक्केवल आत्मसंस्थितः ॥
(आत्मचिन्तन करने वाले पुरुष को चाहिये कि) एकान्त देश में इन्द्रियों को उनके विषयों से हटकर और अन्त:करण को अपने अधीन करके बैठे तथा आत्मा में स्थित होकर और किसी साधन का आश्रय न लेकर शुद्धचित्त हुआ केवल ज्ञानदृष्टि द्वारा एक आत्मा की ही भावना करे।
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