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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 56
यावन्न पश्येदखिलं मदात्मकं तावन्मदाराधनतत्परो भवेत् । श्रद्धालुरत्यूर्जितभक्तिलक्षणो यस्तस्य दृश्योऽहमहर्निशं हृदि ॥
जब तक सारा संसार मेरा ही रूप दिखलायी न दे, तब तक निरन्तर मेरी आराधना करता रहे। जो श्रद्धालु और उत्कट भक्त होता है, उसे अपने हृदय में सर्वदा मेरा ही साक्षात्कार होता है।
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