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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 3
अहं प्रपन्नोऽस्मि पदाम्बुजं प्रभो भवापवर्गं तव योगिभावितम् । यथाञ्जसाज्ञानमपारवारिधिं सुखं तरिष्यामि तथानुशाधि माम् ॥
हे प्रभो! योगिजन जिनका निरन्तर चिन्तन करते हैं, संसार से छुड़ाने वाले उन आपके चरणकमलों की मैं शरण हूँ, आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे मैं सुगमता से ही अज्ञानरूपी अपार समुद्र के पार हो जाऊँ।
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