हे प्रभो! योगिजन जिनका निरन्तर चिन्तन करते हैं, संसार से छुड़ाने वाले उन आपके चरणकमलों की मैं शरण हूँ, आप मुझे ऐसा उपदेश दीजिये, जिससे मैं सुगमता से ही अज्ञानरूपी अपार समुद्र के पार हो जाऊँ।
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