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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 31
देहेन्द्रियप्राणमनश्चिदात्मनां सङ्घादजस्त्रं परिवर्तते धियः । वृत्तिस्तमोमूलतयाज्ञलक्षणा यावद्भवेत्तावदसौ भवोद्भवः ॥
बुद्धि की वृत्ति ही देह, इन्द्रिय, प्राण, मन और चेतन आत्मा के संघातरूप से निरन्तर परिवर्तित होती रहती है। यह वृत्ति तमोगुण से उत्पन्न होने वाली होने के कारण अज्ञानरूपा है और जब तक यह रहती है, तब तक ही संसार में जन्म होता रहता है।
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