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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 10
कर्माकृतौ दोषमपि श्रुतिर्जगौ तस्मात्सदा कार्यमिदं मुमुक्षुणा । ननु स्वतन्त्रा ध्रुवकार्यकारिणी विद्य न किञ्चिन्मनसाप्यपेक्षते ॥
इसलिये मुमुक्षुको उन्हें सर्वदा करते रहना चाहिये। यदि कोई कहे कि ज्ञान स्वतन्त्र है एवं निश्चय ही अपना फल देने वाला है, उसे मन से भी किसी और की सहायता की आवश्यकता नहीं है तो उसका यह कहना ठीक नहीं;
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