ननु क्रिया वेदमुखेन चोदिता
तथैव विद्या पुरुषार्थसाधनम् ।
कर्तव्यता प्राणभृतः प्रचोदिता
विद्यासहायत्वमुपैति सा पुनः ॥
कुछ वितर्कवादी ऐसा कहते हैं कि जिस प्रकार वेद के कथनानुसार ज्ञान पुरुषार्थ का साधक है, वैसे ही कर्म वेदविहित हैं; और प्राणियों के लिये कर्मो की अवश्य-कर्तव्यता का विधान भी है, इसलिये वे कर्मज्ञा के सहकारी हो जाते हैं। साथ ही श्रुति ने कर्म न करने में दोष भी बतलाया है;
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