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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 36
विकल्पमायारहिते चिदात्मके- ऽहङ्कार एष प्रथमः प्रकल्पितः । अध्यास एवात्मनि सर्वकारणे निरामये ब्रह्मणि केवले परे ॥
जो विकल्प और माया से रहित है, उस सबके कारण निरामय, अद्वितीय और चित्स्वरूप परमात्मा ब्रह्म में पहले इस 'अहंकार' रूप अध्यास की ही कल्पना होती है।
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