इस प्रकार सदा आत्मा का अखण्डवृत्ति से चिन्तन करने वाले पुरुष अन्तः:करण में उत्पन्न हुई विशुद्ध भावना तुरन्त ही कारकादि के सहित अविद्या का नाश कर देती है, जिस प्रकार नियमानुसार सेवन की हुई ओषधि रोग को नष्ट कर डालती है।
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