गुरु के समीप रहने से और वेदवाक्यों से आत्मज्ञान का अनुभव होने पर अपने हृदयस्थ उपाधिरहित आत्मा का साक्षात्कार करके आत्मारूप से प्रतीत होने वाले देहादि सम्पूर्ण जडपदार्थो का त्याग कर देना चाहिये।
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