अग्नि से तपे हुए लोहे के समान चिदाभास, साक्षी आत्मा तथा बुद्धि के एकत्र रहने से परस्पर अन्योन्याध्यास होने के कारण क्रमश: उनकी चेतनता और जडता प्रतीत होती है। (अर्थात् जिस प्रकार अग्नि से तपे हुए लोहपिण्ड में अग्नि और लोहे का तादात्म्य हो जाने से लोहेका आकार अग्नि में और अग्नि की उष्णता लोहे में दिखायी देने लगती है, उसी प्रकार बुद्धि और आत्मा का तादात्म्य हो जाने से आत्मा की चेतनता बुद्धि आदि में और बुद्धि आदि की जडता आत्मा में प्रतीत होने लगती है । इसलिये अध्यासवश बुद्धि से लेकर शरीरपर्यन्त अनात्म-वस्तुओं को ही आत्मा मानने लगते हैं)।
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