श्रुतिप्रमाणाभिविनाशिता च सा
कथं भविषत्यपि कार्यकारिणी ।
विज्ञानमात्रादमलाद्वितीयत-
स्तस्मादविद्या न पुनर्भविष्यति ॥
श्रुति-प्रमाण से उसके नष्ट कर दिये जाने पर फिर वह अपना कार्य करने में समर्थ भी किस प्रकार हो सकेगी? क्योंकि परमार्थतत्त्व एकमात्र ज्ञानस्वरूप, निर्मल और अद्वितीय है। अतः (बोध हो जाने पर ) फिर अविद्या उत्पन्न नहीं होगी।
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