फिर शुद्धचित्त होकर श्रद्धापूर्वक गुरु की कृपा से 'तत्त्वमसि' इस महावाक्य के द्वारा परमात्मा और जीवात्मा की एकता जानकर सुमेरु के समान निश्चल एवं सुखी हो जाय।
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