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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 55
इत्थं यदीक्षेत हि लोकसंस्थितो जगन्मृषैवेति विभावयन्मुनिः । निराकृतत्वाच्छ्रुतियुक्तिमानतो यथेन्दुभेदो दिशि दिग्भ्रमादयः ॥
यह जो जगत्‌ है वह श्रुति, युक्ति और प्रमाण से बाधित होने के कारण चन्द्रभेद और दिशाओं में होने वाले दिग्भ्रम के समान मिथ्या ही है - ऐसी भावना करता हुआ लोक (व्यवहार) में स्थित मुनि इसे देखे।
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