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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 28
अनाद्यनिर्वाच्यमपीह कारणं मायाप्रधानं तु परं शरीरकम् । उपाधिभेदात्तु यतः पृथक्स्थितं स्वात्मानमात्मन्यवधारयेत्क्रमात् ॥
(इनके अतिरिक्त) अनादि और अनिर्वाच्य मायामय कारण-शरीर ही जीव का तीसरा देह है। इस प्रकार उपाधि-भेद से सर्वथा पृथक्‌ स्थित अपने आत्मरूप को क्रमश: (उपाधियों का बोध करते हुए) अपने हृदय में निश्चय करे।
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