यह अद्वितीय ज्ञान समस्त श्रुतियों का एकमात्र सार है। इसे वेदान्तवेद्य भगवत्पाद मैंने ही कहा है। जो गुरुभक्तिसम्पन्न पुरुष इसका श्रद्धापू्वक पाठ करेगा, उसकी यदि मेरे वचनों में प्रीति होगी तो वह मेरा ही रूप हो जायगा।
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