नाज्ञानहानिर्न च रागसंक्षयो
भवेत्ततः कर्म सदोषमुद्भवेत् ।
ततः पुनः संसृतिरप्यवारिता
तस्माद्बुधो ज्ञानविचारवान्भवेत् ॥
सकाम कर्म द्वारा अज्ञान का नाश अथवा राग का क्षय नहीं हो सकता, बल्कि उससे दूसरे सदोष कर्म की उत्पत्ति होती है। उससे पुनः संसार की प्राप्ति होना अनिवार्य है। इसलिये बुद्धिमान को ज्ञानविचार में ही तत्पर होना चाहिये।
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