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श्रीरामगीता • अध्याय 1 • श्लोक 30
बुद्धेस्त्रिधा वृत्तिरपीह दृश्यते स्वप्नादिभेदेन गुणत्रयात्मनः । अन्योन्यतोऽस्मिन्व्यभिचारितो मृषा नित्ये परे ब्रह्मणि केवले शिवे ॥
त्रिगुणात्मिका बुद्धि की ही स्वप्न, जाग्रत्‌ और सुषुप्ति - भेद से तीन प्रकार की वृत्तियाँ दिखायी देती हैं, किन्तु इन तीनों वृत्तियों में से प्रत्येक का एक-दूसरी में व्यभिचार होने के कारण ये (तीनों ही) एकमात्र कल्याणस्वरूप नित्य परब्रह्म में मिथ्या हैं (अर्थात्‌ उसमें इन वृत्तियों का सर्वथा अभाव है)।
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